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Mainne Socha Tha Agar

Mohd Rafi
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मैंने सोचा था, अगर मौत से पहले-पहले
मैंने सोचा था, अगर दुनिया के वीरानों में
मैंने सोचा था, अगर हस्ती की शमशानों में

किसी इंसान को बस एक भी इंसान की 'गर
सच्ची बे-लाग मोहब्बत कहीं हो जाए नसीब
वही साहिल जो बहुत दूर नज़र आता है
ख़ुद-ब-ख़ुद खींचता चला आता है कश्ती के क़रीब

मैंने सोचा था, यूँ ही दिल के कँवल खिलते हैं
मैंने सोचा था, यूँ ही सब्र-ओ-सुकून मिलते हैं
मैंने सोचा था, यूँ ही ज़ख़्म-ए-जिगर सिलते हैं

लेकिन, सोचने ही से मुरादें तो नहीं मिल जाती
ऐसा होता तो हर एक दिल की तमन्ना खिलती
कोशिशें लाख सही, बात नहीं बनती है
ऐसा होता तो हर एक राही को मंज़िल मिलती

मैंने सोचा था कि इंसान की क़िस्मत अक्सर
फूट जाती है, बिखरती है, सँभल जाती है
अप्सरा चाँद की बदली से निकल जाती है

पर मेरे बख़्त की गर्दिश का तो कुछ अंत नहीं
ख़ुश्क धरती भी तो मझधार बनी जाती है
क्या मुक़द्दर से शिकायत, क्या ज़माने से गिला
ख़ुद मेरी साँस ही तलवार बनी जाती है

हाय, फिर भी सोचता हूँ
रात की सियाही में तारों के दिए जलते हैं
ख़ून जब रोता है दिल, गीत तभी ढलते हैं
जिनको जीना है, वो मरने से नहीं डरते हैं

इस लिए...
मेरा प्याला है जो ख़ाली तो ये ख़ाली ही सही
मुझ को होंठों से लगाने दो, यूँ ही पीने दो
ज़िंदगी मेरी हर एक मोड़ पे नाकाम सही
फिर भी उम्मीदों को पल-भर के लिए जीने दो
फिर भी उम्मीदों को पल-भर के लिए जीने दो

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